नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पूछा कि क्या वैवाहिक दुष्कर्म की संवैधानिक वैधता पेंडिंग रहने तक पति पर अपनी पत्नी से रेप करने का केस चलाया जा सकता है. भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-375 में दिए गए एक अपवाद के तहत अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है या यौन क्रिया करता है-बशर्ते पत्नी नाबालिग न हो-तो उसे दुष्कर्म नहीं माना जाएगा.
सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कर्नाटक हाई कोर्ट के एक फैसले के बारे में सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि यह छूट पूरी तरह से लागू नहीं होती है, और जो पति अपनी पत्नी पर बिना सहमति के सेक्स के लिए दबाव डालता है, उस पर आईपीसी की धारा 376 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है.
पीठ सेक्शन 375 आईपीसी (अब सेक्शन 63 BNS) के तहत वैवाहिक बलात्कार अपवाद (एक्सेप्शन 2) को चुनौती देने/सपोर्ट करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना भी शामिल थे, ने कहा कि वह याचिकाकर्ताओं की इस बात को पूरी तरह समझती है कि शादी से व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म नहीं होती. याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि शादी के अंदर दुष्कर्म होने पर केस चलना चाहिए.
पीठ ने कहा कि आइए हम कानून को वैसे ही देखें जैसा वह है और यह एक पैनल लॉ है, और इसलिए, किसी व्यक्ति पर केस चलाने से पहले, चाहे वह सही हो या गलत, एक संवैधानिक न्यायालय को यह फैसला देना होगा कि छूट गलत है या साफ तौर पर मनमाना है.
पीठ ने कहा कि तभी इस आधार पर मुकदमा चलाने की इजाज़त दी जा सकती है.
एक वकील की दलील का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि वह यह कह रही हैं कि शादीशुदा ज़िंदगी में अगर कोई व्यक्ति बिना मर्ज़ी के सेक्स करता है, तो वह निश्चित रूप से पीड़ित है. पीठ ने कहा कि सवाल यह है कि पीड़ित होने के बावजूद, राज्य इसे दुष्कर्म मानता है या नहीं. पी ने कहा, “यह छूट किसी अपराधी को नहीं बचाती अगर उसने गंभीर चोट पहुंचाई है या मौत हुई है…”
जस्टिस बागची ने कहा, “जब तक हम छूट के संवैधानिक अधिकारों पर फैसला नहीं कर लेते, क्या केस चलाने की इजाजत दी जा सकती है या नहीं?” सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि तब तक छूट जारी रहनी चाहिए.
पीठ ने यह भी पूछा, “नए कानूनी सिस्टम के तहत एक महिला पर किया जा सकने वाला अपराध…अगर सेक्शन 377 के तहत कोई अपराध, किसी ऐसी महिला पर किया जाता है जो इत्तेफ़ाक से उसकी पत्नी भी है—तो क्या यह अब अपराध नहीं है?” मेहता ने कहा, “आपके जजमेंट के तहत, नहीं.”
एक और वकील ने दलील दी, “अगर आरोपी पति है, तो यह माना जाता है…अगर पति ये काम करता है, तो वह बाहर है.” मेहता ने माफी मांगी और कहा कि काम अप्राकृतिक है या प्राकृतिक, यह कोर्ट का अधिकार क्षेत्र नहीं है. एक वकील ने तर्क दिया कि वैवाहिक दुष्कर्म को अपराधीकरण करने से कोई नया अपराध नहीं बनेगा, क्योंकि यह अपराध पहले से ही कानून में मौजूद है और सिर्फ कुछ लोगों को ही इसके लिए अलग किया गया है.
जस्टिस बागची इस बात से सहमत नहीं थे. “आप संविधान को अलग-अलग करके नहीं देख सकते. जब आर्टिकल 21 के तहत अधिकार की बात आती है, तो यह आर्टिकल 20 के तहत अधिकार पर भी उतना ही असर डालता है.”
उन्होंने कहा, “पैनल कानूनों में, हमें बुरे इरादे (criminal intent), दोषी होने की ज़िम्मेदारी और संविधान को समझने के हमारे तरीके जैसे सवालों को ध्यान में रखना होगा, ताकि हम अपने नागरिकों को हैरान न करें.” विस्तार में दलीलें सुनने के बाद, पीठ ने निर्देश दिया कि मामले को तीन हफ़्ते बाद बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाईके लिए लिस्ट किया जाए. पीठ ने कहा कि केंद्र ने इस मामले में अपना हलफनामा पहले ही फ़ाइल कर दिया है.
केंद्र का हलफ़नामा
अक्टूबर 2024 में, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया, जिसमें वैवाहिक दुष्कर्म को अपराधीकरण करने की मांग करने वाली याचिकाओं का विरोध किया गया था. इसमें कहा गया था कि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंधों के रेगुलेशन के दायरे में आने वाले मामलों में, जो एक सामाजिक मुद्दा है, संसद द्वारा लिए गए कानूनी फ़ैसले की वैधता की जांच करते समय उचित सम्मान दिखाया जाना चाहिए. वैवाहिक दुष्कर्म को इंडियन पैनल कोड (IPC) के सेक्शन 375 के अपवाद 2 के ज़रिए “रेप” के दायरे से बाहर रखा गया है.
वैवाहिक संस्था की प्रकृति
जवाबी हलफ़नामे में, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा कि हमारे सामाजिक-कानूनी माहौल में शादी की प्रकृति को देखते हुए, अगर लेजिस्लेचर का मानना है कि शादी के इंस्टीट्यूशन को बचाने के लिए, जिस छूट पर सवाल उठाया गया है, उसे बनाए रखना चाहिए, तो यह कहा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के लिए उस छूट को रद्द करना सही नहीं होगा.
हलफ़नामे में कहा गया है कि भारत सरकार हर महिला की आज़ादी, सम्मान और अधिकारों की पूरी तरह और सही मायने में रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है, जो एक सभ्य समाज का बुनियादी आधार और पिलर हैं.
सरकार ने कहा कि वह महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा समेत शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक शोषण करने वाली सभी तरह की हिंसा और अपराधों को खत्म करने को सबसे ज़्यादा महत्व देती है. सरकार ने कहा कि शादी से महिला की सहमति खत्म नहीं होती है, और इसका उल्लंघन करने पर सज़ा मिलनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट में फाइल किए गए हलफनामें में कहा गया, “हालांकि, शादी के अंदर ऐसे उल्लंघन के नतीजे शादी के बाहर के नतीजों से अलग होते हैं. संसद ने शादी के अंदर सहमति को बचाने के लिए आपराधिक कानून के प्रावधान समेत अलग-अलग उपाय दिए हैं.”
सरकार ने कहा कि सेक्शन 354, 354A, 354B और 498A और घरेलू हिंसा से महिलाओं का सुरक्षा अधिनियम, 2005 में काफी हद तक सही इलाज दिया गया है, जिसमें सज़ा भी शामिल है, जिससे शादी के अंदर भी एक महिला के अधिकार और सम्मान की रक्षा होती है.
इसमें यह भी कहा गया कि यह अंतर, शादी के इंस्टीट्यूशन के अंदर होने वाले कामों और शादी के इंस्टीट्यूशन के बाहर होने वाले कामों के बीच साफ़ सामाजिक और तार्किक अंतर पर आधारित है, जो एक सही नतीजा है, जिसे संविधान के आर्टिकल 14 और/या आर्टिकल 21 का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता.
केंद्र ने कहा कि पति-पत्नी के बीच शादी के रिश्ते के विनियमन के दायरे में आने वाले मामलों में, जो एक सामाजिक मुद्दा है, संसद के कानूनी फैसले की वैधता को टेस्ट करते समय पूरा सम्मान दिया जाना चाहिए.
हलफनामें में कहा गया, “ऐसे हालात में, संसद ऐसी बातों पर फैसला करती है जो कोर्ट के दायरे से बाहर हो सकती हैं, ऐसे फैसले का आधार यह है कि पार्लियामेंट एक ऐसी बॉडी है जिसे लोग सीधे चुनते हैं और इसलिए माना जाता है कि उसे ऐसे नाजुक और संवेदनशील मामलों पर लोगों की ज़रूरतों और समझ का पता है.”
Leave a comment