उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक हल्के में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब 2023 बैच के तेज-तर्रार आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही ने नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग को एक बेहद विस्फोटक पत्र भेज दिया. 5 पन्नों की इस चिट्ठी में राही ने न सिर्फ जालौन के जिलाधिकारी पर नियमों को ताक पर रखने के गंभीर आरोप लगाए हैं, बल्कि एक अनोखी मांग करते हुए कहा है कि अगर सरकार उनसे पूरे दिन का काम नहीं ले पा रही है, तो 22 जुलाई 2026 से उनका वेतन आधा कर दिया जाए.
ईमानदारी की सजा मिली तबादला
हाल ही में उरई सदर के एसडीएम पद से हटाकर एसडीएम न्यायिक बनाए गए रिंकू सिंह राही ने पत्र में अपने साथ हुए घटनाक्रमों का सिलसिलेवार जिक्र किया है. उन्होंने आरोप लगाया कि एक स्थानीय भाजपा नेता और ब्लॉक प्रमुख के कोल्ड स्टोरेज पर वैधानिक कार्रवाई करने के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया.
चिट्ठी में सीधे डीएम पर निशाना साधते हुए उन्होंने लिखा कि एक विधायक की मौजूदगी में डीएम ने उन्हें तहसील क्षेत्र में अवैध कब्जों और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई न करने का मौखिक आदेश दिया था. जब राही ने बीच का रास्ता निकालते हुए सिर्फ लिखित शिकायतों पर काम शुरू किया, तो शिकायतों का फर्जी निस्तारण करने का दबाव बनाया जाने लगा.
जनता दर्शन को बताया ‘दिखावा’
आईएएस राही ने जिले के प्रशासनिक ढर्रे पर भी तीखे सवाल उठाए हैं. उन्होंने पत्र में लिखा कि “जनपद की रैंकिंग चमकाने के लिए आईजीआरएस और एंटी भू-माफिया मामलों का फर्जी निस्तारण स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया. डीएम साहब के ‘जनता दर्शन’ में बैठना सिर्फ एक दिखावा है, जिससे मेरे अंतर्मन को ठेस पहुंचती है. वहां वक्त गुजारना खुद को धोखा देने जैसा है.”
आधी सैलरी या कैडर बदलने की मांग
अपनी वर्तमान पोस्टिंग का जिक्र करते हुए रिंकू सिंह ने कहा कि अदालत और फाइलों को देखने में उनके बमुश्किल 4 घंटे ही खर्च होते हैं. आठ घंटे के कार्यदिवस के हिसाब से यह सिर्फ 50 फीसदी काम है. उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि “काम नहीं तो पूरा वेतन नहीं.”
राही ने शासन से मांग की है कि या तो उन्हें किसी ऐसी जगह भेजा जाए जहां कानूनों और नियमों के मुताबिक काम करने की आजादी हो. अगर जालौन में ही रखना है, तो सीखने के लिए पर्याप्त मौके देते हुए किसी तहसील में नियमित एसडीएम बनाया जाए. यदि यह संभव नहीं है, तो उत्तर प्रदेश से उनका कैडर बदलने की अनुमति दी जाए. और जब तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं होता, तब तक उनकी सैलरी आधी कर दी जाए.
शाहजहांपुर और राजस्व परिषद लखनऊ में भी अपनी ईमानदारी को लेकर सुर्खियों में रहे रिंकू सिंह राही के इस कदम ने यूपी की ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है. अब देखना यह है कि शासन इस बेहद संवेदनशील और अनोखे पत्र पर क्या रुख अपनाता है.
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