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10 साल की कानूनी लड़ाई के बाद रेलवे को मिली ऐतिहासिक जीत

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अंबाला मंडल की तत्कालीन वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक प्रवीण गौड़ द्विवेदी ने 10 साल तक रेलवे के लिए लड़ी कानूनी लड़ाई

नई दिल्ली,11 फरवरी- भारतीय रेलवे को सुप्रीम कोर्ट से एक ऐतिहासिक और निर्णायक जीत मिली है। लगभग 10 वर्षों से चली आ रही कानूनी लड़ाई में शीर्ष अदालत ने रेलवे प्रशासन के अधिकारों पर लगी न्यायिक आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह खारिज किया। भारतीय रेल यातायात सेवा (आईआरटीएस) की वरिष्ठ अधिकारी प्रवीण गौड़ द्विवेदी से जुड़े इस मामले में आया फैसला न केवल रेलवे के संस्थागत हितों की रक्षा करता है, बल्कि भविष्य में रेलवे प्रशासनिक स्वायत्तता के लिए एक मजबूत कानूनी आधार भी तैयार करता है। बता दें कि मामले की शुरूआत 30 सितंबर, 2016 को हुई, जब अंबाला के तत्कालीन रेलवे मजिस्ट्रेट ने अंबाला मंडल की तत्कालीन वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक प्रवीण गौड़ द्विवेदी को एक अनुरोध भेजा, जिसमें औचक जांच के लिए एक समर्पित टिकट चेकिंग दस्ता देने का अनुरोध किया गया था। मंडल में विशेष महत्वपूर्ण कार्यों को देखते हुए प्रवीन गौड़ द्विवेदी ने रेलवे मजिस्ट्रेट को सूचित किया कि उस विशेष समय पर स्टाफ नहीं छोड़ा जा सकता। उन्होंने एक हलफनामे के माध्यम से यह भी प्रस्तुत किया कि ” स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट दस्ते” के लिए किसी भी स्वीकृत पद के अस्तित्व में न होने के कारण अनुरोध संभव नहीं है। उन्होंने भारतीय रेलवे अधिनियम, 1989 का हवाला देते हुए यह भी बताया कि टिकट चेकिंग स्वाभाविक रूप से एक कार्यकारी कार्य है। जिसमें स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट (एसआरएम) चेक वाणिज्य विभाग के समन्वय से नियमानुसार नियोजित किए जाने चाहिए न कि न्यायपालिका द्वारा एकतरफा मांगे जाने चाहिए।

आईपीसी की धाराओं के तहत शुरू की गई कार्यवाही
बता दें कि स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट ने टिकट चेकिंग दस्ता देने से इन्कार से अंसतुष्ट होकर वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक द्विवेदी को कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसमें पूछा गया कि भारतीय दंड सहिता (IPC) की धारा 186, 187 और 217 के तहत जोकि सरकारी कर्मचारियों द्वारा कार्य में बाधा डालने और निर्देशों की अवज्ञा से संबंधित है, आपके विरूद्ध क्यों न कार्यवाही शुरू की जाए। मामला हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक द्विवेदी ने कानूनी लड़ाई जारी रखी।

सुप्रीम कोर्ट में मिली जीत
बता दें कि महाप्रबंधक, उत्तर रेलवे, सचिव, रेलवे बोर्ड और प्रवीण गौड़ द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट में एक स्पेशल लीव पेटिशन दायर की, जिसमें तर्क दिया गया कि यह कार्यवाही अपने अधिकार क्षेत्र में काम कर रहे एक ईमानदार अधिकारी को परेशान करने के बराबर है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णायक फैसले में निचली अदालतों के विवादित आदेशों को रद्द कर दिया और रेलवे अधिकारी के विरूद्ध चल रहे आपराधिक कार्यवाही को खत्म कर दिया। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है जहां रेलवे मजिस्ट्रेट अपने ही मामले में जज बनना चाहते हैं। अपीलकर्ता ने अपने अधिकारिक क्षमता से बाहर कोई काम नहीं किया था। शीर्ष अदालत का यह फैसला न केवल लगभग 10 वर्षों से मानसिक परेशानियां झेल रही भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) की वरिष्ठ अधिकारी श्रीमती प्रवीण गौड़ द्विवेदी को बरी करता है बल्कि यह एक कानूनी मिसाल भी कायम करता है कि “स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट (SRM) प्रशासनिक मांगों को लागू करने या कार्यकारी टिकट चेकिंग कार्यों की निगरानी के लिए अपराधिक कानून का हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकते।”इस निर्णय से न केवल द्विवेदी को व्यक्तिगत न्याय मिला बल्कि रेलवे की कार्यप्रणाली, अनुशासन और प्रशासनिक स्वतंत्रता की जीत हुई। यह निर्णय भविष्य में किसी भी ईमानदार रेलवे अधिकारी को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय अनावश्यक न्यायिक दबाव से सुरक्षा प्रदान करेगा।

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