नई दिल्ली: नेपाल में आई बाढ़ की आपदा ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र पर मंडरा रहे खतरों को सामने ला दिया है. इस जोखिम को समझने और इसी तरह की स्थिति भारतीय पहाड़ी राज्यों को कैसे प्रभावित करती है, यह जानने के लिए ‘ईटीवी भारत’ ने रुड़की स्थित ‘केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान’ (CBRI) के निदेशक प्रोफेसर प्रदीप कुमार रामंचरला से बातचीत की.
CBRI वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) का ही एक हिस्सा है. प्रोफेसर कुमार ने इस बातचीत में आपदा से निपटने की तैयारियों को बेहतर बनाने के लिए जरूरी कदमों के बारे में विस्तार से समझाया. पेश है उनसे बातचीत का प्रमुख अंश…
सवालः आप नेपाल में बाढ़ की मौजूदा स्थिति का आकलन कैसे करते हैं? वास्तव में वहां क्या हुआ और किस वजह से यह घटना इतनी भयानक हो गई?
जवाबः ऐसा प्रतीत होता है कि इस घटना की शुरुआत असामान्य रूप से गर्म और उमस भरे मौसम के कारण ग्लेशियर की बर्फ बहुत तेजी से पिघलने की वजह से हुई. पिघला हुआ यह पानी ग्लेशियर की दरारों में रिसकर अंदर चला गया और बर्फ तथा उसके नीचे मौजूद चट्टान के बीच की सतह तक पहुंच गया, जिससे तीव्र ढलान पर ग्लेशियर की पकड़ कमजोर हो गई.
इसके बाद ग्लेशियर की बर्फ और चट्टान का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूट गया और काफी ऊंचाई से नीचे आ गिरा. यह टक्कर इतनी जोरदार थी कि इससे लगभग 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसे झटके पैदा हुए… लेकिन ध्यान रहे कि यह कोई भूकंप नहीं था. यह मलबा सीधे नदी के रास्ते में जा गिरा, जहां बड़े-बड़े पत्थरों ने अस्थाई रूप से पानी के बहाव को रोक दिया और एक प्राकृतिक बांध बना दिया. जैसे-जैसे इस बांध के पीछे पानी जमा होता गया, आखिरकार वह रुकावट दबाव नहीं झेल पाई और टूट गई. इसके परिणामस्वरूप अचानक पानी का भारी सैलाब आया और भीषण फ्लैश फ्लड (अचानक आने वाली बाढ़) की स्थिति बन गई.
सवालः क्या इस आपदा के लिए अत्यधिक भारी बारिश जिम्मेदार थी, या इसके पीछे कुछ अन्य कारण भी थे?
जवाबः इस विशेष घटना में, मुख्य ट्रिगर केवल अत्यधिक भारी बारिश होने के बजाय, सामान्य से कहीं अधिक तापमान का होना प्रतीत होता है, जिसकी वजह से बर्फ बहुत तेजी से पिघली. इसके अलावा, वहां के भूगोल ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ग्लेशियर की बर्फ और चट्टानों का एक बहुत बड़ा हिस्सा बेहद तीव्र ढलान वाली ऊंचाई से टूटा और सीधे नीचे गिरा, जिससे नदी प्रणाली में प्रवेश करने से पहले भारी मात्रा में गतिज ऊर्जा पैदा हुई.
सवालः हमने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में बार-बार ऐसी आपदाएं देखी हैं. क्या इस तरह की घटनाएं अब एक बड़ी चिंता का विषय बनती जा रही हैं?
जवाबः हिमालयी क्षेत्र में आने वाले अधिकांश भूस्खलन भारी बारिश के कारण ही होते हैं. लेकिन जो बात विशेष रूप से चिंताजनक है, वह है बारिश का बदलता हुआ पैटर्न. एक लंबी अवधि के दौरान होने वाली कुल बारिश में भले ही कोई बहुत बड़ा बदलाव न आया हो, लेकिन अब हम तेजी से यह देख रहे हैं कि बहुत भारी बारिश कम समय के भीतर एक ही जगह केंद्रित हो जाती है.
जब बहुत कम समय में भारी मात्रा में बारिश होती है, तो नदियों के रास्ते उस अचानक आने वाले पानी के तेज बहाव को संभालने में सक्षम नहीं हो पाते हैं. यही वह समय होता है जब नदी के किनारों पर बनी सड़कें, इमारतें और अन्य बुनियादी ढांचे विशेष रूप से खतरे की जद में आ जाते हैं. हमने हाल के वर्षों में ऐसी कई घटनाएं देखी हैं.
सवालः नेपाल जैसी आपदा के प्रति भारत के पहाड़ी राज्य कितने संवेदनशील हैं? क्या ऐसे कुछ क्षेत्र हैं जिन पर अधिक पैनी नजर रखने की आवश्यकता है?
जवाबः हमें सतर्क रहने और ऐसी चरम घटनाओं से सीख लेने की जरूरत है. पूरे हिमालयी क्षेत्र में कई ऐसे संवेदनशील इलाके हैं, जिनमें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से, साथ ही पश्चिम बंगाल के कुछ पहाड़ी इलाके शामिल हैं. भले ही हर जगह तुरंत कोई खतरा न हो, लेकिन नेपाल जैसी घटनाएं यह साफ बताती हैं कि क्यों संवेदनशील स्थानों की निरंतर निगरानी और बेहतर तैयारी की सख्त आवश्यकता है.
सवालः क्या पहाड़ों में बनी सड़कें, पुल, जलविद्युत (हाइड्रोपावर) परियोजनाएं और अन्य बुनियादी ढांचे इस तरह की चरम आपदाओं को झेलने के लिए डिजाइन किए गए हैं?
जवाबः बड़ी बुनियादी परियोजनाओं को आमतौर पर चरम घटनाओं को ध्यान में रखकर ही डिजाइन किया जाता है. हालांकि, कुछ ऐसी स्थितियां भी आ सकती हैं जहां कोई आपदा डिजाइनिंग के समय लगाए गए अनुमानों से भी कहीं अधिक भयानक रूप ले ले.
जैसे-जैसे अधिक डेटा उपलब्ध होता जा रहा है, विज्ञान और इंजीनियरिंग के मानकों में लगातार सुधार हो रहा है. बड़ी और महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए डिजाइनिंग के दौरान सामान्यतः अतिरिक्त सुरक्षा कारकों पर विचार किया जाता है. हालांकि, छोटी या सामान्य इमारतों/संरचनाओं के लिए हमेशा इस स्तर का इंजीनियरिंग मूल्यांकन संभव नहीं हो पाता है.
सवालः अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन के दौरान लोगों की जान बचाने में अर्ली वार्निंग सिस्टम कितने महत्वपूर्ण हैं?
जवाबः अर्ली वार्निंग बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि आधा घंटा से एक घंटे का समय भी लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए बहुत कीमती साबित हो सकता है. असल चुनौती किसी भी आपदा को सटीक रूप से और समय रहते पहचानना है.
CSIR-CBRI वर्तमान में दो पायलट लोकेशंस पर एक प्रयोगात्मक निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम कर रहा है. ये सिस्टम अभी अनुसंधान के चरण में हैं और इन्हें उत्तराखंड में लगाया गया है. ये अभी केवल टेस्टिंग के दौर से गुजर रहे हैं और सार्वजनिक चेतावनी सेवाओं के लिए अभी चालू नहीं किए गए हैं. एक बार जब इनकी सटीकता और प्रभावशीलता साबित हो जाएगी, तो राज्य सरकारों के सहयोग से इस तरह की तकनीक को अधिक आपदा-संभावित स्थानों पर तैनात किया जा सकता है.
सवालः क्या हमें हिमालय के नाजुक इलाकों में कंस्ट्रक्शन के सख्त नियमों की जरूरत है?
जवाबः जहां तक बुनियादी ढांचे का सवाल है, भारत के पास पहले से ही भवन निर्माण और इंजीनियरिंग कोड मौजूद हैं. यहां सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा उनके कड़ाई से कार्यान्वयन यानी उन्हें जमीन पर सख्ती से लागू करने का है. ‘नेशनल बिल्डिंग कोड’ के भूकंप-रोधी डिजाइन मानकों और ‘इंडियन रोड्स कांग्रेस’ के दिशा-निर्देशों का ठीक से पालन किया जाना चाहिए.
जो देश गंभीर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हैं, वे अक्सर अपने बुनियादी ढांचे को सुरक्षित रखने में इसलिए सफल होते हैं क्योंकि वे इंजीनियरिंग और निर्माण मानकों का कड़ाई से पालन करते हैं. हमें भी यहां उसी स्तर के अनुपालन की आवश्यकता है.
सवालः केंद्र, राज्य सरकार और स्थानीय अधिकारियों को ऐसी आपदाओं से होने वाले जान-माल के नुकसान को कम करने के लिए अब क्या करना चाहिए?
जवाबः बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए उचित प्रोजेक्ट मैनेजमेंट, क्वालिटी एश्योरेंस, क्वालिटी कंट्रोल और तय किए गए डिजाइन मानकों का पालन करना बेहद जरूरी है. स्थानीय अधिकारियों को भी यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि आपदा-संभावित क्षेत्रों में बनने वाली इमारतें और बुनियादी ढांचे निर्धारित सुरक्षा नियमों का पालन करें.
इसके साथ ही, हर बड़ी आपदा का बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए. भयानक घटनाएं अलग-अलग जगहों पर हो सकती हैं, लेकिन किसी एक आपदा से सीखे गए सबक का उपयोग हर जगह तैयारियों को बेहतर बनाने और डिजाइन के बाद की प्रतिक्रिया को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है.
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